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ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर तो चमन में हर तरफ़ जश्न-ए-बहाराँ है
न जाने क्यों गुलों की चाक-दामानी नहीं जाती
तरब सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
न जाने क्यों तरब बार-ए-गराँ होता है मजनूँ को
अगर मैं बात कोई लैला-ए-महमिल से कहती हूँ
इशरत जहाँ तरब
ग़ज़ल
यूँ तो चेहरे पे सजा रक्खी है इक बज़्म-ए-तरब
कितने मक़्तल हैं मिरे सीने के अंदर देखो
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
ये रंग पाश हुए हैं वो आज ऐ 'नादिर'
है फ़र्श-ए-बज़्म-ए-तरब लाला-ज़ार होली में