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नज़्म
फिर वही शब के सराबों का चलन!
ख़ून-ए-दिल नज़्र-ए-गिराँबारी-ए-औक़ात करें
हम तही-दस्त जो आहों में असर माँगते हैं
अख़्तर ज़ियाई
ग़ज़ल
ख़ुल्द में भी हस्ब-ए-आदत वा'ज़ फ़रमाएँगे क्या
शैख़ हूरों से हजामत अपनी बनवाएँगे क्या
हाशिम अज़ीमाबादी
नज़्म
औज-बिन-उनुक़
अपनी कुहनी और कलाई पर चलाता
हसब-ए-मंशा ज़ाइक़े के तौर पर उन को चबाता जा रहा था