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शेर
उमीद-ए-वस्ल ने धोके दिए हैं इस क़दर 'हसरत'
कि उस काफ़िर की हाँ भी अब नहीं मालूम होती है
चराग़ हसन हसरत
ग़ज़ल
बज़्म-ए-दानिश में न मुँह खोलना अपना 'हसरत'
तुझ से उम्मीद नहीं मुझ को समझदारी की
लकी फ़ारुक़ी हसरत
ग़ज़ल
तुम्हें भी 'हसरत' की हालत-ए-हाल पर नहीं रंज
ग़मों का सैलाब सम्त छोड़े उधर गया तो
मोहम्मद फ़य्याज़ हसरत
ग़ज़ल
वही बर्बादी-ए-गुलशन का मूजिब थे और अब भी हैं
चमन सारा हो इस से आश्ना तो क्या तमाशा हो
मोहम्मद फ़य्याज़ हसरत
ग़ज़ल
है करम उस का कि इंसाँ भी अज़ीमुश्शाँ हुआ
वर्ना थी क्या बात जो नूर-ए-ख़ुदा हैराँ हुआ
