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ग़ज़ल
आ मय-कदे में बन के बहार-ए-हवा-ए-सुब्ह
चल दे हर एक जाम को रक़्साँ किए हुए
सलाहुद्दीन फ़ाइक़ बुरहानपुरी
ग़ज़ल
रोके तो कोई 'उम्र-ए-सुबुक-ख़ेज़ को यारो
इक अस्प-ए-सुबुक-गाम है इक आब-ए-रवाँ है