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नज़्म
ख़ुशामद
हीजड़े भाँड ज़नाने की ख़ुशामद कीजे
मस्त ओ हुशियार दिवाने की ख़ुशामद कीजे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
शाएरी पूरा मर्द और पूरी औरत माँगती है
तुम ने किसी हिजड़े के लब पर
शेर का फूल खिले देखा है
हसन अब्बास रज़ा
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ग़ज़ल
मैं दिल की क़द्र क्यूँ न करूँ हिज्र-ए-यार में
उन की सी शोख़ियाँ हैं इसी बे-क़रार में
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
ना-उम्मीदी नाम-ए-तमन्ना अपना मुक़द्दर हिज्र-ए-मुसलसल
दर्द के ख़ारिस्तान में आ के दामन-ए-दिल उलझाए कौन
किश्वर नाहीद
नज़्म
एक नए लफ़्ज़ की तख़्लीक़
सुब्ह-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ भी इक लफ़्ज़ है
शाम-ए-हिज्र-ए-निगाराँ भी इक लफ़्ज़ है