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ग़ज़ल
ज़ख़्म मिलते हैं इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल मिलता नहीं
वज़-ए-क़ातिल रह गई रस्म-ए-मसीहाई गई
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल-ए-सोगवार हो न सका
वो ग़म-नवाज़ रहा ग़म-गुसार हो न सका
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
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ग़ज़ल
किसी भी दर पर इ'लाज-ए-आवेज़िश-ए-यक़ीन-ओ-गुमाँ न होगा
इधर चला आ कि मय-कदे में अगर नहीं है मगर नहीं है
शाद आरफ़ी
नज़्म
दीवाली
'इलाज-ए-तंगी-ए-दामान-ए-याराँ चाहता हूँ मैं
निफ़ाक़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ को गुरेज़ाँ चाहता हूँ मैं
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
दम-ए-आख़िर इलाज-ए-सोज़-ए-ग़म कहने की बातें हैं
मिरा रस्ता न रोकें रास्ता लें चारा-गर अपना
क़मर जलालवी
ग़ज़ल
करो न ज़िक्र सुबू ज़र-निगार है कि नहीं
इलाज-ए-तिश्नगी-ए-बादा-ख़्वार है कि नहीं