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ग़ज़ल
तमाम इल्लत-ए-दरमाँदगी है क़िल्लत-ए-शौक़
तपिश हुई पर-ए-पर्वाज़-ए-मुर्ग़-ए-जाँ के लिए
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
बारिश-ए-संग-ए-अलम अपना मुक़द्दर ठहरी
राहत-ए-दर्द मिली लुत्फ़-ओ-करम के बदले
नूर-ए-शमा नूर
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शायरी के अनुवाद
तारीकी की यूरिश से दिल हार मान लेता है
हार की ये शर्म और ख़स्तगी-ओ-दरमांदगी की ये तौहीन
रबीन्द्र नाथ टैगोर
ग़ज़ल
जिस पर सजाएँ ख़िलअत-ओ-आलात-ए-अस्करी
अम्बोह-ए-बुज़दिलांँ में वो जी-दार भी तो हो
ज़किया शैख़ मीना
ग़ज़ल
पूछा जो मैं हकीम से इल्लत-ए-कुन-फ़काँ है कौन
सोच के उस ने ये कहा ग़ैर-ए-ख़ुदा कोई नहीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
पर्दों की सात परतें लाज़िम थीं
काएनाती तख़्लीक़ का राज़
आलात-ए-मौसीक़ी बेकार हैं
उमैननुज़ ज़हरा सय्यद
ग़ज़ल
हबीब मूसवी
ग़ज़ल
बे-ज़ख़्म सदा देने लगे साज़ अजब क्या
गर करने लगें ख़ुद-बख़ुद आलात-ए-ग़िना रक़्स
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
नज़्म
केंचुली
सभी आलात-ए-जर्राही को मैं ने आज़माया है
मगर वो केंचुली है हस्ती-ए-ख़ुद की अजब आशिक़
ख़ावर नक़ीब
नज़्म
कहाँ जाओगे
और हर कुश्ता-ए-वामाँदगी-ए-आख़िर-ए-शब
भूल कर साअत-ए-दरमांदगी-ए-आख़िर-ए-शब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
दफ़अतन गूँजी सदा फिर आलम-ए-अनवार में
औरतें दुनिया की हाज़िर हों मिरे दरबार में
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
उस को नतीजे इल्लत-ए-ग़ाई की इस को धुन
फ़र्क़ इस क़दर ही बे-ख़बर ओ बा-ख़बर में है
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
ला-रैब तू है 'इल्लत-ए-तज्सीम से बरी
देखूँ दरून-ए-क़ल्ब तिरे नक़्श-ए-पा को मैं