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नज़्म
शा'इर की तमन्नाएँ
मगर क्या कीजिए जब फ़ैसला ये है मशिय्यत का
कि मैं फ़ितरत की आँखों से गिरूँ अश्क-ए-रवाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
ग़ज़ल
इस जहाँ में कौन जलता है पराई आग में
अश्क-ए-ख़ूँ मैं अपनी आँखों से गिराऊँ क्यों भला
प्रेम पाल अश्क
ग़ज़ल
टाइप-राइटर गुंग-महल है शब्दों का दे दान
काग़ज़ अक्षर 'अश्क'-ओ-तबस्सुम सभी रचाएँ दास
प्रेम पाल अश्क
ग़ज़ल
जहाँ पहुँची हैं पर्दे चाक कर के 'इश्क़ की नज़रें
कहाँ तू ने वो मंज़र ऐ निगाह-ए-आम देखा है
अशक संभली
ग़ज़ल
'अश्क' अपने सीना-ए-पुर-ख़ूँ में सैल-ए-अश्क भी
रोक रखता हूँ जिगर के ख़ून की तहलील तक
अश्क अमृतसरी
ग़ज़ल
'अश्क' उसूल-ए-कस्ब-ए-ज़र से तू नहीं है आश्ना
तिश्ना-ए-तकमील है तेरी हमा-दानी हनूज़