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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
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रेख़्ता शब्दकोश
aasaar-e-'ishq chehre par paa.e jaanaa
आसार-ए-'इश्क़ चेहरे पर पाए जाना آثار عشق چہرے پر پائے جانا
چہرے سے ظاہر ہونا کہ کسی پر عاشق ہیں
dar kafe jaam-e-sharyi'at, dar kafe sandaan-e-'ishq
दर कफ़े जाम-ए-शरी'अत, दर कफ़े संदान-ए-'इश्क़ دَر کَفے جامِ شَرِیعَت، دَر کَفے سَنْدانِ عِشْق
صُلح کُل پر عامل، پر ایک سے ملاپ رکھنے والا، موافق و مخالف دونوں کو خوش رکھنے والا.
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नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को
अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझ से मुकरने लगा हूँ मैं
मुझ को संभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मुद्दतों तर्क-ए-तमन्ना पे लहू रोया है
इश्क़ का क़र्ज़ चुकाया है बहुत दिन हम ने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
आलम कितने
जज़्ब होंगे अभी इस ख़ाक-ए-चमन में ऐ दोस्त
अश्क बन बन के गुहर-रेज़ा-ए-शबनम कितने
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े
ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अब सिवा इस के मुदावा-ए-ग़म-ए-दिल क्या है
इतनी पी जाएँ कि हर रंज-ओ-मेहन को भूलें