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ग़ज़ल
'जलाली' जादा-ए-उलफ़त में जब से है क़दम रक्खा
रही उन के तसव्वुर में हमेशा बेकली मुझ को
रऊफ़ यासीन जलाली
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ग़ज़ल
उस गुल-ए-राना की उल्फ़त छुप नहीं सकती कभी
उभरा है दाग़-ए-वफ़ा मेहर-ए-दरख़्शाँ की तरह
रऊफ़ यासीन जलाली
नज़्म
गोरिस्तान-ए-शाही
हो चुका गो क़ौम की शान-ए-जलाली का ज़ुहूर
है मगर बाक़ी अभी शान-ए-जमाली का ज़ुहूर
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
इस कलीद-ए-इस्म-ए-ना-मा'लूम से कैसे खुले
दिल का दरवाज़ा कि अंदर से मुक़फ़्फ़ल हो गया