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ग़ज़ल
हम जो दिन-रात ये इत्र-ए-दिल-ओ-जाँ खींचते हैं
नफ़अ' कम करते हैं ऐ यार ज़ियाँ खींचते हैं
वाली आसी
ग़ज़ल
है मुझ से गरेबान-ए-गुल-ए-सुब्ह मोअत्तर
मैं इत्र-ए-नसीम-ए-चमन ओ बाद-ए-सबा हूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
बिखरे हैं फूल इधर तो धरे हैं उधर को जाम
है बू-ए-इत्र-ए-फ़ित्ना तिरी ख़्वाब-गाह में
मीर मेहदी मजरूह
ग़ज़ल
इत्र-ए-फ़िरदौस-ए-जवाँ में ये बसाए हुए होंट
ख़ून-ए-गुल-रंग-ए-बहाराँ में नहाए हुए होंट