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ग़ज़ल
हमेशा इम्तिसाल-ए-अम्र ख़ालिक़ का इरादा हो
ख़याल-ए-इत्तिबा-ए-अम्र-ए-नफ़सी, दूर हो साहब
सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद
ग़ज़ल
बड़ी ही सहल-ओ-आसाँ ज़िंदगी हो जाएगी तिरी
तू इत्तिबा'-ए-ख़्वाहिशात-ए-ज़िन्दगी को छोड़ तो
गुलज़ार मुरादाबादी
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ग़ज़ल
दिल कुछ सुबूत-ए-हिफ़्ज़-ए-शरीअत न दे सका
साक़ी के लुत्फ़-ए-ख़ास पे इतरा के पी गया