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ग़ज़ल
शराब पी चुके बे-चारे को इजाज़त दो
खड़ा है देर से रुख़्सत को ऐ निगार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
इतनी फ़ुर्सत दे कि रुख़्सत हो लें ऐ सय्याद हम
मुद्दतों इस बाग़ के साये में थे आज़ाद हम
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
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ग़ज़ल
दर-ए-ख़ेमा खुला रक्खा है गुल कर के दिया हम ने
सो इज़्न-ए-आम है लो शौक़-रुख़्सत कौन रखता है
ऐतबार साजिद
नज़्म
जज़्ब-ए-ग़ैरत
चमन में जिस से है इज़्न-ए-शगुफ़्त-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल
गुदाज़ क़ल्ब वो बख़्शा है तुझ को क़ुदरत ने
मसूद अख़्तर जमाल
ग़ज़ल
है दबाव अश्रा हवास पर हैं तमाम उज़्व खिंचे रबर
हूँ उथल-पुथल से घिरा मगर मुझे इज़्न-ए-रद्द-ए-अमल नहीं
तफ़ज़ील अहमद
ग़ज़ल
न इज़्न-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ है कि नौहा-ए-हस्ती
किसे सुनाएँ जो अल्फ़ाज़ ख़ूँ-चकीदा हैं
मुसर्रत जबीं ज़ेबा
ग़ज़ल
जब ख़िलाफ़-ए-मस्लहत है इज़्न-ए-‘अर्ज़-ए-मुद्दआ
ख़ुद-कलामी ही सिखा दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी
उरूज ज़ेहरा ज़ैदी
ग़ज़ल
आँखों आँखों में मोहब्बत का पयाम आ ही गया
मर्हबा इज़्न-ए-विदा-ए-नंग-ओ-नाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
हम इज़्न-ए-अर्ज़-ए-हाल पे अब कश्मकश में हैं
दिल को ये ज़िद है शौक़ का दफ़्तर ही ले चलें