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अप्रचलित ग़ज़लें
ضمان جادہ رویاندن ہے خط جام مے نوشاں
دگر نہ منزل حیرت سے کیا واقف ہیں مدہوشاں
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दिल को चश्म-ए-यार ने जब जाम-ए-मय अपना दिया
उन से ख़ुश हो कर लिया और कह के बिस्मिल्लाह पिया
नज़ीर अकबराबादी
शेर
इक जाम-ए-मय की ख़ातिर पलकों से ये मुसाफ़िर
जारोब-कश रहा है बरसों दर-ए-मुग़ाँ का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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रेख़्ता शब्दकोश
KHudaa se kaam hai
ख़ुदा से काम है خُدا سے کام ہے
बंदा और अल्लाह के दरमयान ताल्लुक़ है , मुराद : आलिम नज़ा, दम-ए-वापसीं
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शेर
भर के साक़ी जाम-ए-मय इक और ला और जल्द ला
उन नशीली अँखड़ियों में फिर हिजाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
मुझे तो जाम-ओ-मय-ओ-गुल का इंतिज़ार नहीं
मैं ख़ुद बहार हूँ मेरे लिए बहार नहीं
अब्दुल मजीद दर्द भोपाली
शेर
जाम-ब-दस्त-ओ-मय-ब-जाम यूँ ही गुज़ार सुब्ह-ओ-शाम
ज़ीस्त की तल्ख़ियाँ मुदाम पी के पिला के भूल जा
ख़ुमार बाराबंकवी
हास्य
तन्क़ीद-ए-जाम-ओ-मय तो बहुत हो चुकी हुज़ूर
अब क्या ख़याल है ग़म-ए-हस्ती के बाब में
सय्यद ज़मीर जाफ़री
कुल्लियात
बोझ तो अच्छा था पर आख़िर गिरौ रखते हुए
वज्ह-ए-जाम-ए-मय न पाया ख़िर्क़ा-ओ-दस्तार को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
हर एक जाम-ए-मय-ए-गुल-गूँ का दा'वेदार बन बैठा
तिरी नीची नज़र उठते ही ईमानों पे क्या गुज़री