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ग़ज़ल
जान आ बर में कि फिर कुछ ग़म-ओ-वसवास नहीं
तू नहीं पास तो फिर कुछ भी मिरे पास नहीं
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
ग़ज़ल
रक़ीबाँ की न कुछ तक़्सीर साबित है न ख़ूबाँ की
मुझे नाहक़ सताता है ये इश्क़-ए-बद-गुमाँ अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन
तेरे गहवारा-ए-आग़ोश में ऐ जान-ए-बहार
जाँ निसार अख़्तर
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नज़्म
हसीं आग
बार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझल
न कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमल
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मौहूम अफ़्साने
वो जिन में मुल्क-ए-बर्क़-ओ-बाद तक तस्ख़ीर होता है
जहाँ इक शब में सोने का महल तामीर होता है
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
इत्तिहाद
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
देहली व लखनऊ
सो फ़लक ने यूँ किया देहली को तो पामाल-ए-जौर
और किया वक़्फ़-ए-जफ़ा हर-बर्ग-ओ-बार-ए-लखनऊ
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
जान-ए-मुज़्तर को न हो क्यूँ दिल-ए-बेताब से हज़
होता अहबाब को है सोहबत-ए-अहबाब से हज़
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
थी यही ख़ुशी उन की इस लिए सुना हम ने
जान-ओ-दिल किया कैसे वक़्फ़-ए-इम्तिहाँ अपना
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
हुआ है रंग-ए-हिना 'ऐश' ज़ेब-ए-पा उस के
ये जाए-ए-रश्क है रुत्बा हो ये हिना के लिए