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ग़ज़ल
सोज़-ए-'मानी' का ज़माने में है किस को एहसास
आज फिर दर्द मिरे पहलू में बेकार उठा
सुलैमान अहमद मानी
ग़ज़ल
चश्म-ए-साक़ी से गिरा जाता है ज़र्फ़-ए-मय-कशाँ
तोड़ दें साग़र जिन्हें एहसास-ए-बेश-ओ-कम हुआ
मानी नागपुरी
ग़ज़ल
कटी एक उम्र-ए-फ़ुर्क़त सर-ए-बर्ज़ख़-ए-मोहब्बत
कि चला न जा रहा था दिल-ए-ना-तवाँ से आगे
मानी नागपुरी
ग़ज़ल
'मानी' कह दो शाइ'री-जुज़वेस्त-अज़-पैग़म्बरी
हम प-ए-तब्लीग़ मुल्क-ए-दिलबरी में आ गए