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ग़ज़ल
'उम्र गुज़री है मिरी इस दश्त में 'आज़र' जहाँ
साँस लेने को शु'ऊर-ए-ज़िंदगी माना गया
दिलावर अली आज़र
ग़ज़ल
जानिब-ए-शहर-ए-ग़ज़ालाँ फिर चली शाम-ए-फ़िराक़
दश्त की बे-ख़्वाबियों का राज़दाँ आएगा क्या
फ़ारूक़ नाज़की
ग़ज़ल
दश्त-ए-आज़ार में ख़ारों पे चलाया हुआ मैं
संग-बारी के तरश्शोह में नहाया हुआ मैं
सय्यद मोहम्मद बाक़र
ग़ज़ल
हम से दीवानों की है जागीर में तैबा का दश्त
ऐ जुनूँ मजनूँ ही को तू जानिब-ए-कोहसार खींच