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ग़ज़ल
न मह ने कौंद बिजली की न शोले का उजाला है
कुछ इस गोरे से मुखड़े का झमकड़ा ही निराला है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
जिस तरफ़ देखो उसी का है झमकड़ा वल्लाह
तालिब अल्लाह का लेता है हर इक शान में ढूँढ
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
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ग़ज़ल
यूँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग
यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मिरे हमराज़ का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
यूँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग
यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मिरे हमराज़ का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
होली की बहारें
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की
ये धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का झक्कड़ हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बरसात की बहारें
ज़रदार की तो उन में है बिछ रही पलंगड़ी
दिलबर परी सी बैठी झमकाए चूड़ी निबगड़ी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दार-उल-मकाफ़ात
है खटका उस के हाथ लगा जो और किसी को दे खटका
और ग़ैब से झटका खाता है जो और किसी के दे झटका
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बेवा की ख़ुद-कुशी
मौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गए
साँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गए
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
आज की दुनिया
झपका रही है देर से आँखें हवा-ए-दहर
कौन-ओ-मकाँ को नींद सी कुछ आ रही है आज
