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ग़ज़ल
वो पेट दिल को लपेट लेवे वो नाफ़ जी को समेट लेवे
मज़ार जी का झपेट लेवे कुछ ऐसा पेड़ू फड़क रहा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
रक़ीब से!
ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
समस्त
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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकले
सितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकले
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
आँख झपकी कि इधर ख़त्म हुआ रोज़-ए-विसाल
फिर भी इस दिन पे क़यामत का गुमाँ है कि जो था