aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "jur.at-e-tark-e-mulaaqaat"
मकताबा-ए-तारिक़, यू. पी.
पर्काशक
अंजुमन तरक़्क़ी पसंद अहल-ए-क़लम, कराची
मुरक़्क़ा-ए-इस्लाम पब्लिशिंग सोसाइटी, मुरादाबाद
खींच लाए न कहीं फिर ये मोहब्बत की कशिशजुरअत-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात करूँ या न करूँ
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताए कोईबात क्या हो गई आख़िर ये जताए कोई
कोशिश-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात का अफ़्सोस नहींअब हमें उन की किसी बात का अफ़्सोस नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताओ तो सहीचाहने वाला कोई हम सा दिखाओ तो सही
मिर्ज़ा ग़ालिब निस्संदेह उर्दू के ऐसे महान शायर हैं जिन्हें विश्व साहित्य के प्रतिष्ठित कवियों की सूची में गर्व के साथ शामिल किया जा सकता है। ग़ालिब की शायरी की एक विशेषता यह भी है कि उनके कलाम में बड़ी तादाद में ऐसे अशआर मौजूद हैं जिन्हें अलग अलग परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। हमने प्रयास किया है कि ग़ालिब के अत्यंत लोकप्रिय अशआर आपके लिए एक साथ पेश किये जाएं। ग़ालिब के समग्र कलाम से केवल २० अशआर का चयन करना कितना कठिन है इसका अन्दाज़ा आपको अवश्य होगा। हम स्वीकार करते हैं कि ग़ालिब के कई बेहतरीन अशआर हमारी सूची में शामिल होने से रह गए हैं। हमें आप ऐसे अशआर बिना किसी संकोच के भेज सकते हैं. हमारा संपादक मंडल आपके द्वारा चिन्हित ऐसे अशआर को टॉप २० सूची में शामिल करने पर विचार कर सकता है। आशा है कि आप इस चयन से लाभान्वित होंगे बेहतर बनाने के लिए हमें अपने क़ीमती सुझावों से अवगत कराते रहेंगे।
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Shumara Number-008
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Jul 1972तर्क-ए-मुस्किरात
Shumara Number-004
Mar 1971तर्क-ए-मुस्किरात
Shumara Number-009
Aug 1971तर्क-ए-मुस्किरात
सबब-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात कोई है तो सहीन सही बात मगर बात कोई है तो सही
या सजन तर्क-ए-मुलाक़ात करोया मिलो दो में से इक बात करो
उन की तरफ़ से तर्क-ए-मुलाक़ात हो गईहम जिस से डर रहे थे वही बात हो गई
जब उस से तर्क-ए-मुलाक़ात का इरादा कियातब उस ने दामन-ए-दिल को ज़रा कुशादा किया
बे-वज्ह उन से तर्क-ए-मुलाक़ात हो गईदुश्मन जो चाहते थे वही बात हो गई
जवाज़-ए-तर्क-ए-ताल्लुक़ बजा सही लेकिनलहू में डूब गए कितने साल किस से कहूँ
हिम्मत-ए-तर्क-ए-वफ़ा डूब गईकिस ने आँखों में उतारा दरिया
बाद-ए-तर्क-ए-आरज़ू बैठा हूँ कैसा मुतमइनहो गई आसाँ हर इक मुश्किल ब-आसानी मिरी
आसान नहीं मरहला-ए-तर्क-ए-वफ़ा भीमुद्दत हुई हम इस को भुलाने में लगे हैं
ख़याल-ए-तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ को टालते रहिएहवा में कोई हयूला उछालते रहिए
ज़बाँ ज़बाँ पे है एलान-ए-तर्क-ए-तम्बाकूतुयूर आम ये पैग़ाम हर तरफ़ कर दें
अपने गुमान-ए-तर्क-ए-मोहब्बत को क्या हुआफिर सामने है एक बदन सोचता हुआ
ख़याल-ए-तर्क-ए-त’अल्लुक़ की ना-रसाई हैहमारे जी में अभी ज़ोर-आज़माई है
उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहींमुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं
तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दियाकिस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई
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