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ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-तलब मय अता हो रिंदों को
ये मै-कदा है यहाँ रस्म-ए-बेश-ओ-कम क्यों हो
मजीद खाम गानवी
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ग़ज़ल
न रास आई कभी मुझ को बज़्म-ए-कम-नज़राँ
'फ़ज़ा' भी बैठ के इन पागलों में क्या करता
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
हम से मिल के फ़ितरत के पेच-ओ-ख़म को समझोगे
हम जहान-ए-फ़ितरत का इक सुराग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ख़ाल-ओ-ख़त के वरक़ लम्हा-ए-रफ़्ता कब का चुरा ले गया
क्या छुपाते हैं अब मेरी बे-चेहरगी की ख़बर आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
जो तिरी महफ़िल से ज़ौक़-ए-ख़ाम ले कर आए हैं
अपने सर वो ख़ुद ही इक इल्ज़ाम ले कर आए हैं