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ग़ज़ल
खुल गया राज़-ए-हाल-ए-दिल जब वो हरीम-ए-नाज़ में
हम से नज़र चुराईए सब से नज़र मिला के भी
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
क्या ख़बर थी इश्क़ में ऐसा भी इक दौर आए है
बात कैसी साँस लेता हूँ तो जी घबराए है
कैफ़ मुरादाबादी
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रेख़्ता शब्दकोश
ba.De aadmii ne daal khaa.ii to kahaa saada-mizaaj hai Gariib ne daal khaa.ii to kahaa kangaal hai
बड़े आदमी ने दाल खाई तो कहा सादा-मिज़ाज है ग़रीब ने दाल खाई तो कहा कंगाल है بَڑےآدْمی نے دال کھائی تو کَہا سادَہ مِزاج ہے غَرِیب نے دال کھائی تو کَہا کَنْگال ہے
ایک ہی کام میں ایک کے لیے بدنامی دوسرے کے لیے نیکنامی ہوتی ہے
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ग़ज़ल
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
दिल में है इक राज़ जो होंटों तक आ सकता नहीं
या'नी मैं जिस हाल में भी हूँ बता सकता नहीं
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
लिए जाता है अज़्म-ए-तर्क-ए-उल्फ़त उन की महफ़िल में
नज़र उठते ही दिल मजबूर हो जाए तो क्या
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
हुस्न-ए-लतीफ़ क्यों हो असीर-ए-निगाह-ए-शौक़
हम ख़ुद ये चाहते हैं कि पर्दा करे कोई
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
ग़म-ए-हस्ती न कुछ फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ है जहाँ मैं हूँ
कि हर हर गाम पर कोई निगहबाँ है जहाँ मैं हूँ
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
चमन वालों से बर्क़-ए-बे-अमाँ कुछ और कहती है
मगर मेरी तो शाख़-ए-आशियाँ कुछ और कहती है
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
तलब इर्तिक़ा की असास है कि ग़म-ए-असीरी का नाम है
कि जहाँ चमन है वहीं क़फ़स जहाँ दाना है वहीं दाम है
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
क्या दिलकशी है अंजुम-ओ-ख़ुर्शीद-ओ-माह में
ऐसे न जाने कितने हैं इस जल्वा-गाह में