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ग़ज़ल
लम्हा लम्हा उन की क़ुर्बत दिल में बसी है मेरे 'कमल'
तर्क-ए-त'अल्लुक़ आसाँ है ये कहना तो आसान लगे
कमल सीतापुरी
ग़ज़ल
मआल-ए-आशिक़ी है अपनी हस्ती से गुज़र जाना
कमाल-ए-ज़िंदगी है मौत से पहले ही मर जाना
कमाल हैदराबादी
ग़ज़ल
'नासिर' कमाल-ए-शेर में दावा नहीं मगर
जो कुछ था मेरे दिल में वो सब कह दिया है ख़ैर