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ग़ज़ल
लहलहाते हुए ख़्वाबों से मिरी आँखों तक
रतजगे काश्त न कर ले तो वो कब सोता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
तकिया
इधर कुछ फ़ासले पर चंद घर थे काश्त-कारों के
जहाँ अब कार-ख़ाने बन गए सरमाया-दारों के
हफ़ीज़ जालंधरी
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नज़्म
हम बे-वतन ख़्वाबों के जोलाहे हैं
हम ने सिर्फ़ चेहरे निभाए रिश्ते नहीं
प्यासी ज़मीनों में आँसू काश्त कर के भी
अंजुम सलीमी
नज़्म
(1) बे-चेहरगी
हम एक ऐसी वादी दरयाफ़्त कर चुके
जहाँ सिर्फ़ दुखों की फ़स्ल काश्त होती है
मुनीर अहमद फ़िरदौस
ग़ज़ल
हुस्न की जितनी ज़मीं होती है ना-क़ाबिल-ए-काश्त
इश्क़ पैदा किया करता है सदा सब में अनाज
शौक़ बहराइची
शेर
हसीबुल हसन
ग़ज़ल
हिज्र के हाथों दिल की ज़मीं पर नाग-फनी जब काश्त हुए
हम ने याद की कलियाँ सूंघीं और महकाई इश्क़ की आग
परवीन सुल्ताना सबा
नज़्म
इब्न-ए-ज़ियाद का फ़रमान
घड़ों में नारियल की काश्त की है
बीच अँगनाई में लिक्खा है
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
हवा सैराब करती है
ज़मीनें चाहिएँ लम्बा तअल्लुक़ काश्त करने को
कहीं रहने को बसने को