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ग़ज़ल
कोई ग़ज़ल में ग़ज़ल है ये हज़रत-ए-'वहशत'
ख़याल था कि ग़ज़ल आप ने कही होगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
फ़रोग़-ए-तब-ए-ख़ुदा-दाद गरचे था 'वहशत'
रियाज़ कम न किया हम ने क्स्ब-ए-फ़न के लिए
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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namaaz-e-vahshat-e-qabr
नमाज़-ए-वहशत-ए-क़ब्र نَمازِ وَحْشَتِ قَبْر
(शिया) वह नमाज़ जो मरने वाले के दफ़्न की पहली रात में दो रकअत पढ़ी जाती है जिससे कि मुर्दे को क़ब्र की बर्बरता से कष्ट न हो
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ग़ज़ल
किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्क़ी 'वहशत'
मैं अगर ख़िदमत-ए-उर्दू-ए-मुअ'ल्ला न करूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
जफ़ा-ए-दुश्मनाँ और बेवफ़ाई-हा-ए-याराँ से
बहुत ग़म-दीदा हो कर 'वहशत'-ए-आज़ुर्दा-जाँ रोया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
बला की होती है 'वहशत' की भी ग़ज़ल-ख़्वानी
कि इक सुरूर सा होता है अहल-ए-महफ़िल को
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
'वहशत' को रहा उन्स जो यूँ फ़न्न-ए-सुख़न से
ये शाख़-ए-हुनर फूलती-फलती ही रहेगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नअत
बिछ गई है चादर-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ दश्त में
तेरे वहशी के लिए सामान-ए-रहमत हो गया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
अब तसव्वुर में कहाँ शक्ल-ए-तमन्ना 'वहशत'
जिस को मुद्दत से न देखा हो वो क्या याद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शेर
किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्क़ी 'वहशत'
मैं अगर ख़िदमत-ए-उर्दू-ए-मुअ'ल्ला न करूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
हवा है शौक़-ए-सुख़न दिल में मौज-ज़न 'वहशत'
कि हम-सफ़ीर मिरा रो'ब सा सुख़न-दाँ है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
मैं न भूलूँ ग़म-ए-इश्क़ का एहसाँ 'वहशत'
उन को पैमान-ए-मोहब्बत जो नहीं याद न हो
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
वो मस्ती-ख़ेज़ नज़रें रफ़्ता रफ़्ता ले उड़ीं मुझ को
किया काशाना-ए-दिल को ख़राब आहिस्ता आहिस्ता
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
मुतरिब-ए-ख़ुल्द क्या सुनाए वहशत-ए-ख़स्ता क्या सुने
मो'तक़िद-ए-क़दीम है ज़मज़मा हिजाज़ का
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
'वहशत' इस मिस्रा-ए-जुरअत ने मुझे मस्त किया
कुछ तो भाया है कि अब कुछ नहीं भाता है मुझे