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ग़ज़ल
हम ने देखे हैं बहुत गर्दिश-ए-अय्याम के रंग
बारहा कश्मकश-ए-चर्ख़-ए-कुहन से निकले
मोहम्मद सईद रज़्मी
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ग़ज़ल
तन फ़र्त-ए-लताफ़त से हो जब रूह-ए-मुजस्सम
क्या ज़ोर चले कश्मकश-ए-बंद-ए-क़बा का
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
ये कश्मकश-ए-शम्स-ओ-क़मर देखते चलिए
आहों का ज़रा अपनी असर देखते चलिए
अब्दुल क़ादिर अहक़र अज़ीजज़ि
नज़्म
परछाइयाँ
मगर उन्हें तो मुरादों की रात मिल जाए
हमें तो कश्मकश-ए-मर्ग-ए-बे-अमाँ ही मिली
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
उस के कूचे में कहाँ कशमकश-ए-बीम-ओ-रजा
ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ भी नहीं ख़्वाहिश-ए-जन्नत भी नहीं
आसी ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
रात-दिन कश्मकश-ए-ज़ुल्फ़-ए-दुता में हूँ मैं
हाए किस पेच में आफ़त में बला में हूँ मैं
अबू मोहम्मद सय्यद हुसैन सैफ़ी
नज़्म
अश्क बहाया मैं ने
किस ने ये कश्मकश-ए-शाम-ए-अलम देखी है
जब कोई दर्द उठा दिल में दबाया मैं ने