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ग़ज़ल
पल दो पल का साथ है अब रौशनी का चल पड़ें
शाम है इक कतबा-ए-क़ब्र-ए-जवाँ खोले हुए
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
क़ब्र में सोएँगे आराम से अब ब'अद-ए-फ़ना
आएगा ख़्वाब-ए-अदम दीदा-ए-बेदार के पास
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ये रख़्ने हैं ये दर हैं ये तिरे अज्दाद के सर हैं
इधर आ कतबा-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ देखने वाले
ग़ौस मोहम्मद ग़ौसी
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ग़ज़ल
ज़र्रा ज़र्रा है यहाँ इक कतबा-ए-सिर्र-ए-अलस्त
आप ही वाक़िफ़ नहीं हैं रस्म-ए-ख़त्त-ए-राज़ से
ग़ुलाम भीक नैरंग
नज़्म
मुहक़क़िक़
तूल-ओ-अर्ज़-ए-क़ब्र से ये साफ़ चलता है पता
गोरकन आए थे अतराफ़-ए-बलोचिस्तान से
रज़ा नक़वी वाही
ग़ज़ल
खंडर में दफ़्न हुई हैं इमारतें क्या क्या
लिखी हैं कत्बा-ए-दिल पर इबारतें क्या किया
रासिख़ इरफ़ानी
ग़ज़ल
ज़िक्र-ए-तारीकी-ए-क़ब्र आया कि ये याद आई
भूले दिल से शब-ए-फ़ुर्क़त की मुसीबत कैसे
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
कुछ दिनों बैठो सर-ए-क़ब्र-ए-'अज़ीज़'-ए-बे-नवा
ख़ानक़ाहों में बहुत दुश्वार है कामिल बनो