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ग़ज़ल
ख़ाक-ए-नशेमन जब उड़ती है दिल से धुआँ सा उठता है
हादसे इस गुलज़ार में वर्ना और बहुत ग़मनाक हुए
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
सेहन-ए-गुलशन से मिरी ख़ाक-ए-नशेमन न उड़ा
ऐ सबा महरम-ए-असरार-ए-गुलिस्ताँ हूँ मैं
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
नशेमन फूँक कर ऐ बर्क़ बिजली कर दिया दिल को
कभी तड़पा कभी लोटा किया ख़ाक-ए-नशेमन पर
सफ़दर मिर्ज़ापुरी
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ग़ज़ल
ख़ाक-ए-'शिबली' से ख़मीर अपना भी उट्ठा है 'फ़ज़ा'
नाम उर्दू का हुआ है इसी घर से ऊँचा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
शेर
ख़ाक-ए-'शिबली' से ख़मीर अपना भी उट्ठा है 'फ़ज़ा'
नाम उर्दू का हुआ है इसी घर से ऊँचा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
पारसा हम-राह ले जाएँगे पिंदार-ए-अमल
हम तो अपने साथ उन की ख़ाक-ए-पा ले जाएँगे
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
ताबिश कानपुरी
ग़ज़ल
जिसे मिल जाए ख़ाक-ए-पाक-ए-दश्त-ए-कर्बला 'परवीं'
पलट कर भी न देखे वो कभी इक्सीर की सूरत
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
जब हो दम-ए-आख़िर तो बचा लेने की ताक़त
फिर ख़ाक-ए-शिफ़ा में न कहीं आब-ए-बक़ा में