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नज़्म
गोरिस्तान-ए-शाही
ऐ हवस ख़ूँ रो कि है ये ज़िंदगी बे-ए'तिबार
ये शरारे का तबस्सुम ये ख़स-ए-आतिश-सवार
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अज़ीज़ हामिद मदनी
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कुल्लियात
जला क्यूँकर न होगा आशियान-ए-बुलबुल-ए-बे-कस
ब-रंग-ए-आतिश-ए-ख़स-पोश रंग-ए-गुल दहकता था
मीर तक़ी मीर
नज़्म
दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर
ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-तवहहुम को जला कर रख दे
यानी आतिश-कदा-ए-सोज़-ए-यकीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
हमारे आशियाँ के ख़ार-ओ-ख़स के तार-ओ-सोज़न से
कर इस चाक क़बा से शो'ले को अपने रफ़ू आतिश
वलीउल्लाह मुहिब
ग़ज़ल
मिरा मज़मूँ सवार-ए-तौसन-ए-तब-ए-रवाँ हो कर
ज़मीन-ए-शेर पर फिरता है गोया आसमाँ हो कर
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
अगरचे मैं ख़त-ए-जादा पे इक गर्द-ए-सफ़र हूँ
खटकता हूँ मगर फिर भी कि मंज़िल की ख़बर हूँ
जावेद अहमद
नज़्म
जज़्बा-ए-उश्शाक़ काम आने को है
जज़्बा-ए-उश्शाक़ काम आने को है
फिर लज़ीज़-ओ-शीरीं जाम आने को है