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ग़ज़ल
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
इज्ज़-ए-ख़ाक-सारी क्यूँ फ़ख़्र-ए-कज-कुलाही क्या
जब मोहब्बतें की हैं फिर कोई गवाही क्या
सलीम कौसर
नज़्म
इदराक
वो मेरी रूह का मक़्सूद-ओ-फ़ख़्र-ए-मौजूदात
उसी के नूर से रौशन है जल्वा-गाह-ए-सिफ़ात
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
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ग़ज़ल
मेरे पीछे पड़ गए हैं सैकड़ों बुत ऐ ख़ुदा
कर अता ईमाँ को मेरे पाएदारी का लिबास
अब्दुल हफ़ीज़ ख़लिश तस्क़ीनी
ग़ज़ल
ख़िलअत-ए-फ़क़्र का तालिब हूँ मगर ख़्वाहिश-ए-दुनिया
चिपकी रहती है बदन से मिरी पोशाक की मानिंद