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ग़ज़ल
जवाब इस का सही देगा कोई तो इस को खोलूँगा
बना कर एक गठरी मैं ने रखी है सवालों की
अर्पित शर्मा अर्पित
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ग़ज़ल
मैं रात का भेद तो खोलूँगा जब नींद न मुझ को आएगी
क्यूँ चाँद सितारे आते हैं हर रात मुझे समझाने को
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
फ़रार की पहली रात
घर का दरवाज़ा किसी पर भी न अब खोलूँगा
चाहे मेहमान हो या कोई हवा का झोंका
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
महफ़िल का ये अंदाज़ कहाँ वो हैं कहाँ मैं
दुनिया को ख़बर होगी जो खोलूँगा ज़बाँ मैं