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ग़ज़ल
आरज़ू जागा करेगी और सो जाऊँगा मैं
रफ़्ता-रफ़्ता एक दिन पत्थर का हो जाऊँगा मैं
अखिलेश चंद्र पांडेय
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ग़ज़ल
है आफ़त-ए-जाँ हुस्न की शोख़ी भी अदा भी
होंटों पे तबस्सुम भी है नज़रों में हया भी
महेश चंद्र नक़्श
ग़ज़ल
हुई जब शम्अ रौशन बज़्म में परवाने जाग उट्ठे
जुनूँ ने इस तरह अंगड़ाई ली दीवाने जाग उट्ठे
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
ग़ज़ल
रसन-ओ-दार से या कू-ए-बुताँ से उट्ठे
फ़ित्ना हर हाल में फ़ित्ना है जहाँ से उट्ठे
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
ग़ज़ल
ज़िंदगी ख़्वाब भी है फ़ित्ना-ए-बेदार भी है
नग़्मा-ए-अम्न भी है नारा-ए-पैकार भी है
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
नज़्म
तुझे ख़ुद से अलग कैसे करूँ मैं
तुझे ख़ुद से अलग कैसे करूँ में
तुझे जब खींचता हूँ ख़ुद से बाहर

