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ग़ज़ल
कुनह ज़ात-ए-हक़ को क्या पावे कोई 'हातिम' कभू
सब के आजिज़ हैं यहाँ वहम-ओ-गुमाँ फ़हम ओ क़यास
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
नज़्म
मुहासरा
तमाम सूफ़ी ओ सालिक सभी शुयूख़ ओ इमाम
उमीद-ए-लुत्फ़ पे ऐवान-ए-कज-कुलाह में हैं
अहमद फ़राज़
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ग़ज़ल
बशीर बद्र
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
हो गई रुस्वा ज़माने में कुलाह-ए-लाला-रंग
जो सरापा नाज़ थे हैं आज मजबूर-ए-नियाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुफ़्लिसी
टोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्म
क्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़म
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
सर-ए-खुसरव से नाज़-ए-कज-कुलाही छिन भी जाता है
कुलाह-ए-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती




