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ग़ज़ल
इब्न-ए-चमन है तेरी वफ़ाओं पे जाँ-निसार
अपना बना के तू ने मुकम्मल क्या मुझे
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
अब भी है हम को अहल-ए-चमन बस उन्हीं से प्यार
इस दिल को बार बार दुखाने के बअ'द भी
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
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ग़ज़ल
मैं कभी तन्हा नहीं होता सर-ए-कुंज-ए-चमन
वो न हों तो हाथ में दस्त-ए-सबा रखता हूँ मैं
सहबा अख़्तर
ग़ज़ल
फ़ुर्सत-ए-शब में तेरा ध्यान आ जाता है
कुंज-ए-चमन क्यूँकर घर की दहलीज़ करूँ
ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क
नज़्म
गंग-ओ-जमन
कुंज-ए-क़फ़स में जल्वा-ए-सहन-ए-चमन कहाँ
बुलबुल तो ढूँढती है गुल-ओ-यासमन कहाँ
शातिर हकीमी
ग़ज़ल
मुद्दतों के बाद फिर कुंज-ए-हिरा रौशन हुआ
किस के लब पर देखना हर्फ़-ए-दुआ रौशन हुआ