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ग़ज़ल
मुद्दतों के बाद फिर कुंज-ए-हिरा रौशन हुआ
किस के लब पर देखना हर्फ़-ए-दुआ रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
हिरा क़ासमी
ग़ज़ल
हिरा क़ासमी
ग़ज़ल
चल रहा है ज़िंदगी का कारवाँ 'हीरा' मगर
दौर-ए-महँगाई ने जीवन का सुकूँ छीना तो है
हीरालाल यादव हीरा
ग़ज़ल
उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या
जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
अदा वो नीची निगाहों की है कि जैसे 'ज़फ़र'
तलाश-ए-कुंज-ए-ग़ज़ालान-ए-ख़ुर्द-साला करें