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aapas kaa ranj-o-malaal ba.Dhnaa
आपस का रंज-ओ-मलाल बढ़ना آپس کا رنج و ملال بڑھنا
एक दूसरे के साथ वैमनस्य या मन-मुटाव अधिक होना
baasii phuulo.n baas nahii.n pardesii balam kii aas nahii.n
बासी फूलों बास नहीं परदेसी बलम की आस नहीं باسی پُھولوں باس نَہیں پَردیسی بَلَم کی آس نَہیں
ek joruu saare kumba ko bas hai
एक जोरू सारे कुंबा को बस है ایک جورو سارے کُنْبَہ کو بَس ہے
एक स्त्री पूरे परिवार के लिए काफी है अथवा एक होशियार औरत पूरे घर को संभाल सकती है
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ग़ज़ल
चलते हैं कू-ए-यार में है वक़्त-ए-इम्तिहाँ
हिम्मत न हारना दिल-ए-बीमार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्यूँ न ख़ू-ए-ख़ाक से ख़स्ता रहे मेरी अना
पा-ब-गिल हूँ और ख़मीर-ए-मोतबर मिट्टी का है
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
सुब्ह कू-ए-यार में बाद-ए-सबा पकड़ी गई
या'नी ग़ीबत में गुलों की मुब्तला पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
यही धुन थी कहीं मेरा दिल-ए-गुम-गश्ता मिल जाए
इसी वहशत में बरसों ख़ाक छानी कू-ए-जानाँ की
मोहम्मद अब्बास सफ़ीर
ग़ज़ल
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
निगाहों को ज़बाँ करना ख़मोशी को बयाँ करना
अयाँ करना भी राज़-ए-दिल कभी तो यूँ अयाँ करना
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
'अबस है पेश-ए-अर्बाब-ए-सुख़न अज़्म-ए-सुख़न मुझ को
वफ़ा कहने न देगी क़िस्सा-ए-रंज-ओ-मेहन मुझ को