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ग़ज़ल
हैं बहम मौज-ए-शराब ओ सैल-ए-अश्क ओ जू-ए-ख़ूँ
लाइक़-ए-सज्दा है जिस को ख़ाक-ए-मय-ख़ाना कहें
अली जवाद ज़ैदी
ग़ज़ल
जब सब ही यहाँ लाइक़-ए-गर्दन-ज़दनी हैं
फिर तुम ही कहो हम ही ख़ता-वार हुए क्यूँ
क़मर सिद्दीक़ी फ़तेहपूरी
ग़ज़ल
बे-ख़ुदी-ए-ज़ौक़-ए-सज्दा ने ये आलम कर दिया
सर तो सर अब तो निगाहें भी उठा सकता नहीं