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शेर
ब-वक़्त-ए-बोसा-ए-लब काश ये दिल कामराँ होता
ज़बाँ उस बद-ज़बाँ की मुँह में और मैं ज़बाँ होता
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
चाहे जब ख़ामोश हों हम चाहे जब बातें करें
तिश्नगी हो और प्यासे लब-ब-लब बातें करें
मोहम्मद असलम रज़ा ख़्वाजा
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ग़ज़ल
मिलते मिलते रह गई आँख उस की चश्म-ए-मस्त से
होते होते लब-ब-लब साग़र से साग़र रह गया
अनवरी जहाँ बेगम हिजाब
ग़ज़ल
बंदा-ए-मोहर-ब-लब हूँ मैं सना-ख़्वाँ तेरा
दिल में रहता है मुक़फ़्फ़ल ग़म-ए-पिन्हाँ तेरा
जोश मलसियानी
ग़ज़ल
चश्म-ब-चश्म रू-ब-रू सीना-ब-सीना दिल-ब-दिल
साक़-ब-साक़-ओ-लब-ब-लब पाए-ब-पाए सर-ब-सर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शेर
होश-ओ-बे-होशी की मंज़िल एक है रस्ते जुदा
ख़ुश्क-ओ-तर सारे जहाँ का लब-ब-लब साहिल में है
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
रह-ए-तलब की सख़्तियों के शिकवे लब-ब-लब हुए
सुरूर-ए-जिद्द-ओ-जहद को ख़ुमार कर लिया गया
इफ़्फ़त अब्बास
नज़्म
एक पुराना शहर
मोहर-ब-लब वीरान दरीचे दरवाज़े सुनसान
दूर पहाड़ों की चोटी पर शाही गोरिस्तान
मख़मूर सईदी
शेर
ख़्वाब में बोसा लिया था रात ब-लब-ए-नाज़की
सुब्ह दम देखा तो उस के होंठ पे बुतख़ाला था
ममनून निज़ामुद्दीन
ग़ज़ल
ग़म-ब-दिल शुक्र-ब-लब मस्त ओ ग़ज़ल-ख़्वाँ चलिए
जब तिलक साथ तिरे उम्र-ए-गुरेज़ाँ चलिए