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ग़ज़ल
पेश-ए-आशिक़ चश्म-ए-गिर्यान-ओ-लब-ए-खंदाँ है एक
जल गया जो नख़्ल उस को बर्क़ और बाराँ है एक
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
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ग़ज़ल
ले के आई तो सबा उस गुल-ए-चीनी का पयाम
वो सही ज़ख़्म की सूरत लब-ए-ख़ंदाँ तो खुला
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
गुल-ए-रूख़्सारा का नज़्ज़ारा तू कर आँखें खोल
अंग्बीं चखने को फिर दिल लब-ए-ख़ंदान में आ
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
हम्द
मिरी ख़ुशियाँ कि मेरे ग़म तुम्हारी ही 'इनायत से
लब-ए-ख़ंदाँ ओ चश्म-ए-नम तुम्हारी ही 'इनायत से
नियाज़ जयराजपुरी
ग़ज़ल
उस बुत से मिल कर इस दिल-ए-नादाँ को क्या हुआ
क्यूँ आह-ओ-ज़ारी है लब-ए-ख़ंदाँ को क्या हुआ
ललन चौधरी
कुल्लियात
क्या जानूँ किस के तीं लब-ए-ख़ंदाँ कहे है ख़ल्क़
मैं ने जो आँखे खोल के देखीं सो चश्म-ए-तर
मीर तक़ी मीर
क़ितआ
यही बाइ'स है कि ग़फ़लत में फँसी है दुनिया
लब-ए-ख़ंदाँ की है कसरत एवज़-ए-दीदा-ए-तर