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ग़ज़ल
लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-अलम ही से सुकूँ आ जाए है
दिल मिरा उन की नवाज़िश से तो घबरा जाए है
सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर
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ग़ज़ल
बदला न मेरा रंज-ओ-अलम हाए रे क़िस्मत
दिल और मचल जाता है दिल-गीर के आगे
मक़्सूद आलम ख़ाँ आलम बरेलवी
ग़ज़ल
मिला क्या क्या न उन से हम को ऐ 'आलम' मोहब्बत में
सितम ढाया करें वो हम तो एहसानात कहते हैं