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ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुझी को ये सफ़्फ़ाकी-ए-हुनर भी मिली
इक एक लफ़्ज़ को यूँ बे-लिबास कर जाना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
अजब है खेल कैरम का
लो उस की शर्त भी सुन लो कि
कनीज़-ए-ख़ास को ले कर ही रानी आप की होगी
इब्न-ए-मुफ़्ती
ग़ज़ल
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले
ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो 'अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच