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शेर
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ पे मौक़ूफ़ नहीं लुत्फ़-ए-सुख़न
आँख ख़ामोश अगर है तो ज़बाँ कुछ भी नहीं
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
शेर
'वहशत' सुख़न ओ लुत्फ़-ए-सुख़न और ही शय है
दीवान में यारों के तो अशआर बहुत हैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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नज़्म
फ़ितरत-ए-दुश्मन
यक़ीनन इंक़लाब-ए-हिन्द होगा ऐ 'सुख़न' होगा
हमें ज़ेबा है अपने घर में झंडा सुर्ख़ लहराना
टीका राम सुख़न
नज़्म
ईश्वर प्रार्थना
फिर यक़ीं आए 'सुख़न' ये इंक़िलाब है ज़िंदाबाद
हिंदू-ओ-मुस्लिम का हाँ अब रंग लाया है जिहाद
टीका राम सुख़न
ग़ज़ल
वो जो हैं लज़्ज़त-ए-तफ़्हीम-ए-सुख़न से वाक़िफ़
शे'र सुनते हैं वही लोग मुकर्रर मुझ से
अब्दुल वहाब सुख़न
नज़्म
थम गई ताल अन्फ़ास की
दम-ब-ख़ुद सारे सुर रह गए
झिलमिलाने लगी शम्अ'-ए-लुत्फ़-ओ-सुरूर
अब्दुल वहाब सुख़न
ग़ज़ल
मिरी सरिश्त-ए-'सुख़न' में हैं कुछ नए उस्लूब
नई ग़ज़ल ने मुझे भी ख़ुश-आमदीद कहा
अब्दुल वहाब सुख़न
ग़ज़ल
गो 'लुत्फ'-ए-ख़ुफ़्ता-बख़्त के आओ न ख़्वाब में
लेकिन तिरे ख़याल को नित दिल में राह है
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
ग़ज़ल
'हातिम' ख़मोश लुत्फ़-ए-सुख़न कुछ नहीं रहा
बकता अबस फिरे है कोई नुक्ता-दाँ नहीं