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नज़्म
औरत
जा रहा है अपनी मंज़िल की तरफ़ माह-ए-तमाम
जैसे क़ब्रों के मुजाविर जैसे मस्जिद के इमाम
शातिर हकीमी
नज़्म
माह-ए-तमाम
मह-ए-तमाम फ़क़त देखता नहीं है हमें
वो जब्र-ओ-क़ैद-ए-मुसलसल पे इक मशक़्क़त की
नईम जर्रार अहमद
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vaa'da-e-maah-e-tamaam
वा'दा-ए-माह-ए-तमाम وعدۂ ماہ تمام
promise that is to be kept or fulfilled on the night of full moon
mah nau mii shavad maah-e-tamaam aahista aahista
मह नौ मी शवद माह-ए-तमाम आहिस^ता आहिस^ता مَہ نَو می شَوَد ماہِ تَمام آہِستَہ آہِستَہ
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) नया चांद आहिस्ता आहिस्ता पूरा होजाता है, हर नाक़िस तरक़्क़ी करते करते कामिल हो जाता है, किसी को कमाल रफ़्ता रफ़्ता हासिल होता है
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ग़ज़ल
कम-निगाही होर तग़ाफ़ुल मत कर ऐ माह-ए-तमाम
मुक तिरा करता है ग़म्ज़ा काम 'आशिक़ का तमाम
क़ुर्बी वेलोरी
शेर
जिस वक़्त कि कोठे पर वो माह-ए-तमाम आवे
क्या दूर है गर उस को सूरज का सलाम आवे
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए
हम हर बुर्ज में घटते घटते सुब्ह तलक गुमनाम हुए
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमाम
चाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
साँझ-समय कुछ तारे निकले पल-भर चमके डूब गए
अम्बर अम्बर ढूँढ रहा है अब उन्हें माह-ए-तमाम कहाँ
इब्न-ए-इंशा
क़ितआ
तो चमकता है उफ़ुक़ पर अभी मानिंद-ए-हिलाल
आसमाँ वक़्त का है मुंतज़िर-ए-माह-ए-तमाम
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
अपने यज़्दाँ से इक सवाल मिरा
मिस्ल-ए-माह-ए-तमाम तू मुझ को
रास्ता क्यों दिखा नहीं सकता