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ग़ज़ल
मय-ख़ाना-ओ-मय-ए-इश्क़-ए-बुताँ और ये सिन-ओ-साल
'तनवीर' ख़ुदा का भी ज़रा ख़ौफ़ कर अब तो
तनवीर देहलवी
ग़ज़ल
जब से हूँ हल्क़ा-ब-गोश-ए-दर-ए-मय-ख़ाना-ए-इश्क़
शीशा पहलू में है और हाथ में पैमाना-ए-इश्क़
वली काकोरवी
लेख
अबुल एजाज़ हफ़ीज़ सिद्दीक़ी
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शेर
मैं न जानूँ काबा-ओ-बुत-ख़ाना-ओ-मय-ख़ाना कूँ
देखता हूँ हर कहाँ दस्ता है तुज मुख का सफ़ा
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
मय-ख़ाना-ए-हस्ती में अक्सर हम अपना ठिकाना भूल गए
या होश में जाना भूल गए या होश में आना भूल गए
अब्दुल हमीद अदम
शेर
सालिक लखनवी
नज़्म
इशरत-ए-तन्हाई
मैं कि मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त का पुराना मय-ख़्वार
महफ़िल-ए-हुस्न का इक मुतरिब-ए-शीरीं-गुफ़्तार
असरार-उल-हक़ मजाज़
शेर
लग़्ज़िश-ए-साक़ी-ए-मय-ख़ाना ख़ुदा ख़ैर करे
फिर न टूटे कोई पैमाना ख़ुदा ख़ैर करे