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ग़ज़ल
बहार-ए-कैफ़-आगीं मख़्ज़न-ए-आलाम होती है
क़फ़स की सुब्ह से बेहतर चमन की शाम होती है
शाइर फ़तेहपुरी
ग़ज़ल
बदला न मेरा रंज-ओ-अलम हाए रे क़िस्मत
दिल और मचल जाता है दिल-गीर के आगे
मक़्सूद आलम ख़ाँ आलम बरेलवी
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ग़ज़ल
मिला क्या क्या न उन से हम को ऐ 'आलम' मोहब्बत में
सितम ढाया करें वो हम तो एहसानात कहते हैं