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ग़ज़ल
जानता हूँ नाज़ फिर भी सब्र की ताक़त नहीं
बाग़-ए-दिल को एक दिन नज़्र-ए-ख़िज़ाँ होना ही था
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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जानता हूँ नाज़ फिर भी सब्र की ताक़त नहीं
बाग़-ए-दिल को एक दिन नज़्र-ए-ख़िज़ाँ होना ही था