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ग़ज़ल
टिकटिकी बाँध के देखा किया इतना कि बना
साया-ए-मर्दुम-ए-दीदा मगस-ए-जाम-ए-शराब
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
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ग़ज़ल
मौक़ा-ए-दीद जब आया तो निगह ख़ीरा हुई
मर्दुम-ए-दीदा अजब वक़्त में बीमार हुए
मुंशी ठाकुर प्रसाद तालिब
ग़ज़ल
मर्दुम-ए-दीदा को है ख़िलअत-ए-ज़र की ख़्वाहिश
जल्वा-फ़रमा हो तू ऐ मेहर-लक़ा आँखों में
करामत अली शहीदी
कुल्लियात
मर्दुम-ए-दीदा-ए-तर मर्दुम-ए-आबी हैं मगर
रहते हैं रोज़ ओ शब ओ शाम-ओ-सहर पानी में
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
नक़्शा उस का मर्दुम-ए-दीदा में मेरे नक़्श है
या'नी सूरत उस ही की फिरती है चश्म-ए-नम के बीच
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
हैं मर्दुम-ए-ग़म-दीदा के दाँतों की तरह बंद
मिस्ल-ए-दहन-ए-नंग है ज़िंदान हमारा
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
निगाह-ए-दीदा-ए-ता'बीर के हवाले 'ख़लिश'
है ये बयाज़ अलग इंतिख़ाब-ए-ख़्वाब के साथ