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ग़ज़ल
मस्त-ए-शराब-ए-इश्क़ वो बे-ख़ुद है जिस को हश्र
ऐ 'दर्द' चाहे लाए ब-ख़ुद पर न ला सके
ख़्वाजा मीर दर्द
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ग़ज़ल
न लाज़िम नीस्ती उस को न हस्ती ही ज़रूरी है
बयाँ क्या कीजिए ऐ 'दर्द' मुमकिन की ननाही को
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
दिल का हर दर्द था सर्माया-ए-हस्ती लेकिन
'फ़ैज़' ने अपनी ही उल्फ़त का गला घोंट दिया
दर्द फ़ैज़ ख़ान
शेर
दर्द-ए-दिल के वास्ते पैदा किया इंसान को
वर्ना ताअत के लिए कुछ कम न थे कर्र-ओ-बयाँ