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ग़ज़ल
मरजा-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ है वो बुत नाम-ए-ख़ुदा
भेजते हैं उसे हिन्दू ओ मुसलमाँ काग़ज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
शेर
मरजा-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ है वो बुत नाम-ए-ख़ुदा
भेजते हैं उसे हिन्दू ओ मुसलमाँ काग़ज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
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ग़ज़ल
मरजा-ए-बर्क़-ए-बला है ऐ 'वफ़ा' दुनिया-ए-इश्क
हासिल-ए-हसरत यहाँ जुज़ हसरत-ए-हासिल नहीं
मेला राम वफ़ा
नज़्म
दो-आबा बस्त जालंधर
राय-ज़ादों और सरदारोँ की ख़ाक-ए-पाक तू
शाइ'रान-ए-ख़ुश-बयाँ का मरजा-ए-इदराक तू
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
बस-कि वो चश्म-ओ-चराग़-ए-महफ़िल-ए-अग़्यार है
चुपके-चुपके जलते हैं जूँ शम्-ए-मातम-ख़ाना हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मरजा’-ए-'इश्क़ फ़क़त ज़ात-ए-ख़ुदा है 'सलमान'
वादी-ए-'इश्क़ में क्यों तुम को ख़ुदा याद नहीं
सलमान काज़मी
नज़्म
पयाम-ए-हस्ती
जो इस आलम में चलना है तुझे हुक्म-ए-अइद्दू पर
तो इस्तेदाद-ए-दफ़ा-ए-हमला-ए-अग़्यार पैदा कर
अज़ीमुद्दीन अहमद
ग़ज़ल
कह दो बक़्क़ाल पिसर से कि मिरा दिल ले कर
क़स्द-ए-अख़्ज़-ए-दिल-ए-अग़्यार न हाँ कीजिएगा