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ग़ज़ल
'मरकज़'-ए-जुमला-काएनात मज़हर-ए-ज़ात-ए-किब्रिया
तेरे सिवा नहीं हुआ बहर-ए-ख़ुदा तू कौन है
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ग़ज़ल
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
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ग़ज़ल
जुमला अदवार ओ शयूनात से जल्वा करते
शान-ए-'मरकज़' में वो सुबहान बने बैठे हैं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ग़ज़ल
मर्कज़-ए-दीदा-ए-ख़ुबान-ए-जहाँ हैं भी तो क्या
एक निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना